धर्मनगरी हरिद्वार स्थित परमार्थ आश्रम के गंगा घाट पर वामन जयंती के पावन अवसर पर भव्य धार्मिक एवं दीक्षा समारोह आयोजित किया गया। षड्दर्शन साधु समाज एवं अखिल भारतीय सनातन धर्म रक्षा समिति के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित समारोह में नीदरलैंड्स निवासी के.पी. भारद्वाज को सनातन परंपरा के अनुसार विधिवत दीक्षा प्रदान की गई। दीक्षा के उपरांत उन्हें ‘स्वामी केशवानंद गिरि’ नाम प्रदान किया गया। साथ ही उन्हें समिति का अंतरराष्ट्रीय संरक्षक नियुक्त किए जाने की घोषणा की गई।
दीक्षा समारोह श्री शंभू पंच दसनाम नागा संन्यासी आवाहन अखाड़े (13 मढ़ी) के प्रमुख एवं षड्दर्शन साधु समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री महंत गोपाल गिरि जी के सानिध्य में संपन्न हुआ। दीक्षा की धार्मिक प्रक्रिया में महामंडलेश्वर स्वामी चेतनानंद गिरि जी, श्री महंत थानापति रविगिरि जी, श्री महंत स्वामी गीतानंद गिरि जी तथा महंत थानापति किशन पुरी जी सहित पंच परमेश्वर ने पौराणिक रीति-रिवाजों के अनुसार अनुष्ठान संपन्न कराया।
दीक्षा के बाद संत समाज ने नवदीक्षित स्वामी केशवानंद गिरि को आशीर्वाद प्रदान किया तथा उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़े दायित्व सौंपे जाने की घोषणा की।
यूरोपीय देशों में सनातन के विस्तार पर मंथन
समारोह के उपरांत आयोजित बैठक में यूरोपीय देशों में सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने तथा भारतीय आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के प्रचार-प्रसार को लेकर चर्चा हुई।
इस दौरान षड्दर्शन साधु समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री महंत गोपाल गिरि जी ने स्वामी केशवानंद गिरि को यूरोप में सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए ‘जगद्गुरु’ पद की उपाधि प्रदान किए जाने का प्रस्ताव रखा। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी चेतनानंद गिरि जी एवं महामंत्री श्री महंत गीतानंद गिरि जी ने प्रस्ताव का समर्थन किया। बताया गया कि इस संबंध में अंतिम निर्णय आगामी औपचारिक बैठक में लिया जाएगा।
संत-महात्माओं और श्रद्धालुओं की रही मौजूदगी
वामन जयंती के अवसर पर आयोजित इस धार्मिक समारोह में विश्व हिंदू पीठ हरिद्वार के अध्यक्ष आचार्य मदन जी महाराज सहित क्षेत्र के अनेक प्रमुख साधु-संत, विद्वान एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। गंगा तट पर वैदिक एवं धार्मिक अनुष्ठानों के बीच आयोजित समारोह आध्यात्मिक वातावरण से ओत-प्रोत रहा।
समारोह के दौरान संतों ने सनातन परंपरा, भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर भी विचार व्यक्त किए।





