108 प्रकार की जड़ी बूटियों के अर्क से बनाया विशालकाय पारद शिवलिंग।

हरिद्वार की पावन धरती एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण की साक्षी बनी, जब श्री साई शिव गंगा धाम में विश्व के सबसे विशाल 5211 किलोग्राम वजनी पारद शिवलिंग की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा वैदिक मंत्रोच्चार, यज्ञ और दिव्य अनुष्ठानों के बीच सम्पन्न हुई। तीन दिनों तक चले इस विराट आयोजन में देशभर से हजारों श्रद्धालु, संत-महात्मा और विशिष्ट अतिथि शामिल हुए।

गंगा तट पर स्थित श्री साई शिव गंगा धाम इन दिनों भक्ति, साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बना रहा। यहां स्थापित किया गया 5211 किलोग्राम वजनी पारद शिवलिंग केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक विज्ञान और साधना की अद्भुत उपलब्धि माना जा रहा है।

ध्यान गुरु रघुनाथ गुरुजी ने लगभग दस वर्षों की साधना, शोध और पारद विज्ञान के गहन अध्ययन के बाद इस दिव्य शिवलिंग का निर्माण कराया। इसमें पारा, चांदी, स्वर्ण और 108 दुर्लभ जड़ी-बूटियों के अर्क का उपयोग किया गया है।

गुरु गोरक्षनाथ परंपरा, गिरनार के पूज्य पीर योगी महंत सोमनाथ बापू के आशीर्वाद और पद्मभूषण डॉ. विजय भटकर के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुए इस आयोजन का उद्देश्य विश्व शांति, मानव कल्याण और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश जन-जन तक पहुंचाना था।

पूरे समारोह के दौरान वैदिक मंत्रों की गूंज, हवन की पवित्र अग्नि और श्रद्धालुओं की आस्था ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के अनेक प्रतिष्ठित संत और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। जगद्गुरु शंकराचार्य, स्वामी सुधांशु जी महाराज, स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज, स्वामी कैलाशानंद गिरी जी महाराज, स्वामी रविन्द्र पुरी जी महाराज, साध्वी ऋतंभरा जी, आचार्य मनीष जी सहित कई संत-महात्माओं ने इस दिव्य आयोजन की गरिमा बढ़ाई।

राजनीति, समाजसेवा और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े अनेक विशिष्ट अतिथियों ने भी समारोह में भाग लेकर इसे ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया।

इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में उद्योगपति और समाजसेवी राजीव बंसल की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। उन्होंने आयोजन की व्यवस्थाओं और समन्वय में सक्रिय योगदान दिया।

राजीव बंसल ने कहा कि साईं बाबा की कृपा और आशीर्वाद से उन्हें इस पुण्य कार्य में सेवा का अवसर मिला, जिसे वे अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।

आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ-साथ ध्यान गुरु रघुनाथ गुरुजी समाज सेवा, दिव्यांग सशक्तिकरण, महिला किसान विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे अभियानों से भी जुड़े हुए हैं। उनका मानना है कि अध्यात्म तभी सार्थक है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक सकारात्मक परिवर्तन पहुंचाए।

विश्व के इस विशाल पारद शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता और मानव कल्याण का एक विराट संदेश बनकर उभरी है।

“ध्यान से शांति, शांति से सद्भाव और सद्भाव से विश्व कल्याण” — इसी संदेश के साथ यह ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ, जिसकी गूंज आने वाले वर्षों तक श्रद्धालुओं के हृदय में बनी रहेगी।

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